श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.14.19

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यामाश्रित्येन्द्रियारातीन्दुर्जयानितराश्रमैः।

वयं जयेम हेलाभिर्दस्यून्दुर्गपतिर्यथा॥ १९

yāmāśrityendriyārātīndurjayānitarāśramaiḥ|

vayaṃ jayema helābhirdasyūndurgapatiryathā|| 19

अर्थ

इन्द्रियरूप शत्रु अन्य आश्रमवालोंके लिये अत्यन्त दुर्जय हैं; किन्तु जिस प्रकार किलेका स्वामी सुगमतासे ही लूटनेवाले शत्रुओंको अपने अधीन कर लेता है, उसी प्रकार हम अपनी विवाहिता पत्नीका आश्रय लेकर इन इन्द्रियरूप शत्रुओंको सहजमें ही जीत लेते हैं॥ १९॥

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