इन्द्रियरूप शत्रु अन्य आश्रमवालोंके लिये अत्यन्त दुर्जय हैं; किन्तु जिस प्रकार किलेका स्वामी सुगमतासे ही लूटनेवाले शत्रुओंको अपने अधीन कर लेता है, उसी प्रकार हम अपनी विवाहिता पत्नीका आश्रय लेकर इन इन्द्रियरूप शत्रुओंको सहजमें ही जीत लेते हैं॥ १९॥
यामाश्रित्येन्द्रियारातीन्दुर्जयानितराश्रमैः।
वयं जयेम हेलाभिर्दस्यून्दुर्गपतिर्यथा॥ १९
इन्द्रियरूप शत्रु अन्य आश्रमवालोंके लिये अत्यन्त दुर्जय हैं; किन्तु जिस प्रकार किलेका स्वामी सुगमतासे ही लूटनेवाले शत्रुओंको अपने अधीन कर लेता है, उसी प्रकार हम अपनी विवाहिता पत्नीका आश्रय लेकर इन इन्द्रियरूप शत्रुओंको सहजमें ही जीत लेते हैं॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.14.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 300) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/14/19/