श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.13.45

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

स वै बत भ्रष्टमतिस्तवैष ते

यः कर्मणां पारमपारकर्मणः।

यद्योगमायागुणयोगमोहितं

विश्‍वं समस्तं भगवन् विधेहि शम्॥ ४५

sa vai bata bhraṣṭamatistavaiṣa te

yaḥ karmaṇāṃ pāramapārakarmaṇaḥ|

yadyogamāyāguṇayogamohitaṃ

viśvaṃ samastaṃ bhagavan vidhehi śam|| 45

अर्थ

जो पुरुष आपके कर्मोंका पार पाना चाहता है, अवश्य ही उसकी बुद्धि नष्ट हो गयी है; क्योंकि आपके कर्मोंका कोई पार ही नहीं है। आपकी ही योगमायाके सत्त्वादि गुणोंसे यह सारा जगत् मोहित हो रहा है। भगवन्! आप इसका कल्याण कीजिये॥ ४५॥

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