श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.48

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

शब्दब्रह्मात्मनस्तस्य व्यक्ताव्यक्तात्मनः परः।

ब्रह्मावभाति विततो नानाशक्त्युपबृंहितः॥ ४८

śabdabrahmātmanastasya vyaktāvyaktātmanaḥ paraḥ|

brahmāvabhāti vitato nānāśaktyupabṛṃhitaḥ|| 48

अर्थ

हे तात! ब्रह्माजी शब्दब्रह्मस्वरूप हैं। वे वैखरीरूपसे व्यक्त और ओंकाररूपसे अव्यक्त हैं तथा उनसे परे जो सर्वत्र परिपूर्ण परब्रह्म है, वही अनेकों प्रकारकी शक्तियोंसे विकसित होकर इन्द्रादि रूपोंमें भास रहा है॥ ४८॥

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