श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.47

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

ऊष्माणमिन्द्रियाण्याहुरन्तःस्था बलमात्मनः।

स्वराः सप्त विहारेण भवन्ति स्म प्रजापतेः॥ ४७

ūṣmāṇamindriyāṇyāhurantaḥsthā balamātmanaḥ|

svarāḥ sapta vihāreṇa bhavanti sma prajāpateḥ|| 47

अर्थ

उनकी इन्द्रियोंको ऊष्मवर्ण (श ष स ह) और बलको अन्तःस्थ (य र ल व) कहते हैं, तथा उनकी क्रीडासे निषाद, ऋषभ, गान्धार, षड्ज, मध्यम, धैवत और पंचम—ये सात स्वर हुए॥ ४७॥

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