॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.12.47
ऊष्माणमिन्द्रियाण्याहुरन्तःस्था बलमात्मनः।
स्वराः सप्त विहारेण भवन्ति स्म प्रजापतेः॥ ४७
ūṣmāṇamindriyāṇyāhurantaḥsthā balamātmanaḥ|
svarāḥ sapta vihāreṇa bhavanti sma prajāpateḥ|| 47
अर्थ
उनकी इन्द्रियोंको ऊष्मवर्ण (श ष स ह) और बलको अन्तःस्थ (य र ल व) कहते हैं, तथा उनकी क्रीडासे निषाद, ऋषभ, गान्धार, षड्ज, मध्यम, धैवत और पंचम—ये सात स्वर हुए॥ ४७॥