श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.12.11

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

हृदिन्द्रियाण्यसुर्व्योम वायुरग्‍निर्जलं मही।

सूर्यश्‍चन्द्रस्तपश्चैव स्थानान्यग्रे कृतानि मे२॥ ११

hṛdindriyāṇyasurvyoma vāyuragnirjalaṃ mahī|

sūryaścandrastapaścaiva sthānānyagre kṛtāni me|| 11

अर्थ

तुम्हारे रहनेके लिये मैंने पहलेसे ही हृदय, इन्द्रिय, प्राण, आकाश, वायु, अग्‍नि, जल, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा और तप—ये स्थान रच दिये हैं॥ ११॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—ते।

    (मुद्रित पृष्ठ 287)

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