यह दो परार्धका काल अव्यक्त, अनन्त, अनादि, विश्वात्मा श्रीहरिका एक निमेष माना जाता है॥ ३७॥✎ 248
कालोऽयं द्विपरार्धाख्यो निमेष उपचर्यते।
अव्याकृतस्यानन्तस्य अनादेर्जगदात्मनः॥ ३७
यह दो परार्धका काल अव्यक्त, अनन्त, अनादि, विश्वात्मा श्रीहरिका एक निमेष माना जाता है॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 286) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/11/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)