श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.11.36

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अयं तु कथितः कल्पो द्वितीयस्यापि भारत।

वाराह इति विख्यातो यत्रासीत्सूकरो हरिः॥ ३६

ayaṃ tu kathitaḥ kalpo dvitīyasyāpi bhārata|

vārāha iti vikhyāto yatrāsītsūkaro hariḥ|| 36

अर्थ

विदुरजी! इस समय जो कल्प चल रहा है, वह दूसरे परार्धका आरम्भक बतलाया जाता है। यह वाराहकल्प-नामसे विख्यात है, इसमें भगवान्‌ने सूकररूप धारण किया था॥ ३६॥✎ 248

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #248 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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