ये दोनों अयन मिलकर देवताओंके एक दिन-रात होते हैं तथा मनुष्यलोकमें ये ‘वर्ष’ या बारह मास कहे जाते हैं। ऐसे सौ वर्षकी मनुष्यकी परम आयु बतायी गयी है॥ १२॥
अयने चाहनी प्राहुर्वत्सरो द्वादश स्मृतः।
संवत्सरशतं नॄणां परमायुर्निरूपितम्॥ १२
ये दोनों अयन मिलकर देवताओंके एक दिन-रात होते हैं तथा मनुष्यलोकमें ये ‘वर्ष’ या बारह मास कहे जाते हैं। ऐसे सौ वर्षकी मनुष्यकी परम आयु बतायी गयी है॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.11.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 283) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/11/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1006 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नृणां → नॄणां