श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.16

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

चतुर्थ ऐन्द्रियः सर्गो यस्तु ज्ञानक्रियात्मकः।

वैकारिको देवसर्गः पञ्चमो यन्मयं मनः॥ १६

caturtha aindriyaḥ sargo yastu jñānakriyātmakaḥ|

vaikāriko devasargaḥ pañcamo yanmayaṃ manaḥ|| 16

अर्थ

चौथी सृष्टि इन्द्रियोंकी है, यह ज्ञान और क्रियाशक्तिसे सम्पन्‍न होती है। पाँचवीं सृष्टि सात्त्विक अहंकारसे उत्पन्‍न हुए इन्द्रियाधिष्ठाता देवताओंकी है, मन भी इसी सृष्टिके अन्तर्गत है॥ १६॥✎ 242 243 244 245

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #242 शब्दोंके बीचका स्थान: सृष्टियोंकाभी → सृष्टियोंका भी
  • #243 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #244 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #245 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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