श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.10.12

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

विश्‍वं वै ब्रह्मतन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया।

ईश्‍वरेण परिच्छिन्‍नं कालेनाव्यक्तमूर्तिना॥ १२

viśvaṃ vai brahmatanmātraṃ saṃsthitaṃ viṣṇumāyayā|

īśvareṇa paricchinnaṃ kālenāvyaktamūrtinā|| 12

अर्थ

पहले यह सारा विश्‍व भगवान्‌की मायासे लीन होकर ब्रह्मरूपसे स्थित था। उसीको अव्यक्तमूर्ति कालके द्वारा भगवान्‌ने पुनः पृथक् रूपसे प्रकट किया है॥ १२॥✎ 242 243 244 245

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #242 शब्दोंके बीचका स्थान: सृष्टियोंकाभी → सृष्टियोंका भी
  • #243 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #244 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #245 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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