॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.1.43
नूनं नृपाणां त्रिमदोत्पथानां
महीं मुहुश्चालयतां चमूभिः।
वधात्प्रपन्नार्तिजिहीर्षयेशो-
ऽप्युपैक्षताघं भगवान् कुरूणाम्॥ ४३
nūnaṃ nṛpāṇāṃ trimadotpathānāṃ
mahīṃ muhuścālayatāṃ camūbhiḥ|
vadhātprapannārtijihīrṣayeśo-
'pyupaikṣatāghaṃ bhagavān kurūṇām|| 43
अर्थ
यद्यपि कौरवोंने उनके बहुत-से अपराध किये, फिर भी भगवान्ने उनकी इसीलिये उपेक्षा कर दी थी कि वे उनके साथ उन दुष्ट राजाओंको भी मारकर अपने शरणागतोंका दुःख दूर करना चाहते थे, जो धन, विद्या और जातिके मदसे अंधे होकर कुमार्गगामी हो रहे थे और बार-बार अपनी सेनाओंसे पृथ्वीको कँपा रहे थे॥ ४३॥✎ 188