किंतु भाई! मुझे इसका कुछ भी खेद अथवा आश्चर्य नहीं है। जगद्विधाता भगवान् श्रीकृष्ण ही मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करके लोगोंकी मनोवृत्तियोंको भ्रमित कर देते हैं। मैं तो उन्हींकी कृपासे उनकी महिमाको देखता हुआ दूसरोंकी दृष्टिसे दूर रहकर सानन्द विचर रहा हूँ॥ ४२॥✎ 188
सोऽहं हरेर्मर्त्यविडम्बनेन
दृशो नृणां चालयतो विधातुः।
नान्योपलक्ष्यः पदवीं प्रसादा-
च्चरामि पश्यन् गतविस्मयोऽत्र॥ ४२
किंतु भाई! मुझे इसका कुछ भी खेद अथवा आश्चर्य नहीं है। जगद्विधाता भगवान् श्रीकृष्ण ही मनुष्योंकी-सी लीलाएँ करके लोगोंकी मनोवृत्तियोंको भ्रमित कर देते हैं। मैं तो उन्हींकी कृपासे उनकी महिमाको देखता हुआ दूसरोंकी दृष्टिसे दूर रहकर सानन्द विचर रहा हूँ॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.1.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 240) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/1/42/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)