आप भक्तजनोंकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले भगवान् अनिरुद्धजी सुखपूर्वक हैं न, जिन्हें शास्त्र वेदोंके आदिकारण और अन्तःकरणचतुष्टयके चौथे अंश मनके अधिष्ठाता बतलाते हैं*॥ ३४॥✎ 18712951296
अपिस्विदास्ते भगवान् सुखं वो
यः सात्वतां कामदुघोऽनिरुद्धः।
यमामनन्ति स्म ह शब्दयोनिं
मनोमयं सत्त्वतुरीयतत्त्वम्॥ ३४
आप भक्तजनोंकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाले भगवान् अनिरुद्धजी सुखपूर्वक हैं न, जिन्हें शास्त्र वेदोंके आदिकारण और अन्तःकरणचतुष्टयके चौथे अंश मनके अधिष्ठाता बतलाते हैं॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 3.1.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 239) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/3/1/34/
टिप्पणियाँ
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चित्त, अहंकार, बुद्धि और मन—ये अन्तःकरणके चार अंश हैं। इनके अधिष्ठाता क्रमशः वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध हैं।
(मुद्रित पृष्ठ 239)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#187 शब्दोंके बीचका स्थान: विष्णु-भगवान् की → विष्णु-भगवान्की
#1295 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विष्णु-भगवान्की → विष्णुभगवान्की
#1296 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): स्वामि-कार्तिक → स्वामिकार्तिक