श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.29

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

कच्चित्सुखं सात्वतवृष्णिभोज-

दाशार्हकाणामधिपः स आस्ते।

यमभ्यषिञ्चच्छतपत्रनेत्रो

नृपासनाशां परिहृत्य दूरात्॥ २९

kaccitsukhaṃ sātvatavṛṣṇibhoja-

dāśārhakāṇāmadhipaḥ sa āste|

yamabhyaṣiñcacchatapatranetro

nṛpāsanāśāṃ parihṛtya dūrāt|| 29

अर्थ

सात्वत, वृष्णि, भोज और दाशार्हवंशी यादवोंके अधिपति महाराज उग्रसेन तो सुखसे हैं न, जिन्होंने राज्य पानेकी आशाका सर्वथा परित्याग कर दिया था किंतु कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णने जिन्हें फिरसे राजसिंहासनपर बैठाया॥ २९॥✎ 186 1294

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #186 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1294 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राजसिंहा-सनपर → राजसिंहासनपर

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