श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 3.1.26

तृतीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

कच्चित्पुराणौ पुरुषौ स्वनाभ्य-

पाद्मानुवृत्त्येह किलावतीर्णौ।

आसात उर्व्याः कुशलं विधाय

कृतक्षणौ कुशलं शूरगेहे॥ २६

kaccitpurāṇau puruṣau svanābhya-

pādmānuvṛttyeha kilāvatīrṇau|

āsāta urvyāḥ kuśalaṃ vidhāya

kṛtakṣaṇau kuśalaṃ śūragehe|| 26

अर्थ

विदुरजी कहने लगे—उद्धवजी! पुराणपुरुष बलरामजी और श्रीकृष्णने अपने ही नाभिकमलसे उत्पन्‍न हुए ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे इस जगत‍्में अवतार लिया है। वे पृथ्वीका भार उतारकर सबको आनन्द देते हुए अब श्रीवसुदेवजीके घर कुशलसे रह रहे हैं न?॥ २६॥✎ 186 1294

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #186 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #1294 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राजसिंहा-सनपर → राजसिंहासनपर

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