॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 3.1.21
तत्राथ शुश्राव सुहृद्विनष्टिं
वनं यथा वेणुजवह्निसंश्रयम्।
संस्पर्धया दग्धमथानुशोचन्
सरस्वतीं प्रत्यगियाय तूष्णीम्॥ २१
tatrātha śuśrāva suhṛdvinaṣṭiṃ
vanaṃ yathā veṇujavahnisaṃśrayam|
saṃspardhayā dagdhamathānuśocan
sarasvatīṃ pratyagiyāya tūṣṇīm|| 21
अर्थ
वहाँ उन्होंने अपने कौरव बन्धुओंके विनाशका समाचार सुना, जो आपसकी कलहके कारण परस्पर लड़-भिड़कर उसी प्रकार नष्ट हो गये थे, जैसे अपनी ही रगड़से उत्पन्न हुई आगसे बाँसोंका सारा जंगल जलकर खाक हो जाता है। यह सुनकर वे शोक करते हुए चुपचाप सरस्वतीके तीरपर आये॥ २१॥