श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.44

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप।

ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे॥ ४४

nāradaḥ prāha munaye sarasvatyāstaṭe nṛpa|

dhyāyate brahma paramaṃ vyāsāyāmitatejase|| 44

अर्थ

परीक्षित्! जिस समय मेरे परमतेजस्वी पिता सरस्वतीके तटपर बैठकर परमात्माके ध्यानमें मग्न थे, उस समय देवर्षि नारदजीने वही भागवत उन्हें सुनाया॥ ४४॥✎ 176 177 178 179

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #176 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #177 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #178 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #179 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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