श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.38

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरये विहिताञ्जलिः।

सर्वभूतमयो विश्‍वं ससर्जेदं स पूर्ववत्॥ ३८

antarhitendriyārthāya haraye vihitāñjaliḥ|

sarvabhūtamayo viśvaṃ sasarjedaṃ sa pūrvavat|| 38

अर्थ

जब सर्वभूतस्वरूप ब्रह्माजीने देखा कि भगवान्‌ने अपने इन्द्रियगोचर स्वरूपको हमारे नेत्रोंके सामनेसे हटा लिया है, तब उन्होंने अंजलि बाँधकर उन्हें प्रणाम किया और पहले कल्पमें जैसी सृष्टि थी, उसी रूपमें इस विश्‍वकी रचना की॥ ३८॥✎ 176 177 178 179

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #176 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #177 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #178 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #179 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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