॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.9.31
यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः।
तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात्॥ ३१
yāvānahaṃ yathābhāvo yadrūpaguṇakarmakaḥ|
tathaiva tattvavijñānamastu te madanugrahāt|| 31
अर्थ
मेरा जितना विस्तार है, मेरा जो लक्षण है, मेरे जितने और जैसे रूप, गुण और लीलाएँ हैं—मेरी कृपासे तुम उनका तत्त्व ठीक-ठीक वैसा ही अनुभव करो॥ ३१॥✎ 175