श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.9.31

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यावानहं यथाभावो यद्रूपगुणकर्मकः।

तथैव तत्त्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात्॥ ३१

yāvānahaṃ yathābhāvo yadrūpaguṇakarmakaḥ|

tathaiva tattvavijñānamastu te madanugrahāt|| 31

अर्थ

मेरा जितना विस्तार है, मेरा जो लक्षण है, मेरे जितने और जैसे रूप, गुण और लीलाएँ हैं—मेरी कृपासे तुम उनका तत्त्व ठीक-ठीक वैसा ही अनुभव करो॥ ३१॥✎ 175

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #175 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् ने → श्रीभगवान्‌ने

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