श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.5

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

प्रविष्टः कर्णरन्ध्रेण स्वानां भावसरोरुहम्।

धुनोति शमलं कृष्णः सलिलस्य यथा शरत्॥ ५

praviṣṭaḥ karṇarandhreṇa svānāṃ bhāvasaroruham|

dhunoti śamalaṃ kṛṣṇaḥ salilasya yathā śarat|| 5

अर्थ

श्रीकृष्ण कानके छिद्रोंके द्वारा अपने भक्तोंके भावमय हृदयकमलपर जाकर बैठ जाते हैं और जैसे शरद् ऋतु जलका गँदलापन मिटा देती है, वैसे ही वे भक्तोंके मनोमलका नाश कर देते हैं॥ ५॥

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