श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.2

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

एतद् वेदितुमिच्छामि तत्त्वं वेदविदां वर।

हरेरद्भुतवीर्यस्य कथा लोकसुमङ्गलाः३॥ २

etad veditumicchāmi tattvaṃ vedavidāṃ vara|

hareradbhutavīryasya kathā lokasumaṅgalāḥ|| 2

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने कहा—भगवन्! आप वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ हैं। मैं आपसे यह जानना चाहता हूँ कि जब ब्रह्माजीने निर्गुण भगवान्‌के गुणोंका वर्णन करनेके लिये नारदजीको आदेश दिया, तब उन्होंने किन-किनको किस रूपमें उपदेश किया? एक तो अचिन्त्य शक्तियोंके आश्रय भगवान्‌की कथाएँ ही लोगोंका परम मंगल करनेवाली हैं, दूसरे देवर्षि नारदका सबको भगवद्दर्शन करानेका स्वभाव है। अवश्य ही आप उनकी बातें मुझे सुनाइये ॥ १-२॥ महाभाग्यवान् शुकदेवजी! आप मुझे ऐसा उपदेश कीजिये कि मैं अपने आसक्तिरहित मनको सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्णमें तन्मय करके अपना शरीर छोड़ सकूँ॥ ३॥ ✎ 165

यह व्याख्या श्लोक 2.8.1 से 2.8.3 तककी एक साथ है।

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० पा०—योगे सुमंगलाः।

    (मुद्रित पृष्ठ 218)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #165 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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