श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.14

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

यस्मिन् कर्मसमावायो यथा येनोपगृह्यते।

गुणानां गुणिनां चैव परिणाममभीप्सताम्॥ १४

yasmin karmasamāvāyo yathā yenopagṛhyate|

guṇānāṃ guṇināṃ caiva pariṇāmamabhīpsatām|| 14

अर्थ

देव, मनुष्य आदि योनियाँ सत्त्व, रज, तम—इन तीन गुणोंके फलस्वरूप ही प्राप्त होती हैं। उनको चाहनेवाले जीवोंमेंसे कौन-कौन किस-किस योनिको प्राप्त करनेके लिये किस-किस प्रकारसे कौन-कौन कर्म स्वीकार करते हैं?॥ १४॥✎ 167 168

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #167 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #168 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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