श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.13

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

कालस्यानुगतिर्या तु लक्ष्यतेऽण्वी बृहत्यपि।

यावत्यः कर्मगतयो यादृशीर्द्विजसत्तम॥ १३

kālasyānugatiryā tu lakṣyate'ṇvī bṛhatyapi|

yāvatyaḥ karmagatayo yādṛśīrdvijasattama|| 13

अर्थ

ब्राह्मणश्रेष्ठ! कालकी सूक्ष्म गति त्रुटि आदि और स्थूल गति वर्ष आदि किस प्रकारसे जानी जाती है? विविध कर्मोंसे जीवोंकी कितनी और कैसी गतियाँ होती हैं॥ १३॥✎ 167 168

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #167 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #168 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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