पहले आपने बतलाया था कि विराट् पुरुषके अंगोंसे लोक और लोकपालोंकी रचना हुई और फिर यह भी बतलाया कि लोक और लोकपालोंके रूपमें उसके अंगोंकी कल्पना हुई। इन दोनों बातोंका तात्पर्य क्या है?॥ ११॥✎ 166
पुरुषावयवैर्लोकाः सपालाः पूर्वकल्पिताः।
लोकैरमुष्यावयवाः सपालैरिति शुश्रुम॥ ११
पहले आपने बतलाया था कि विराट् पुरुषके अंगोंसे लोक और लोकपालोंकी रचना हुई और फिर यह भी बतलाया कि लोक और लोकपालोंके रूपमें उसके अंगोंकी कल्पना हुई। इन दोनों बातोंका तात्पर्य क्या है?॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.8.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 219) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/8/11/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)