श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.8.10

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

स चापि यत्र पुरुषो विश्‍वस्थित्युद्भवाप्ययः।

मुक्‍त्वाऽऽत्ममायां मायेशः शेते सर्वगुहाशयः॥ १०

sa cāpi yatra puruṣo viśvasthityudbhavāpyayaḥ|

muktvā''tmamāyāṃ māyeśaḥ śete sarvaguhāśayaḥ|| 10

अर्थ

जिनकी कृपासे सर्वभूतमय ब्रह्माजी प्राणियोंकी सृष्टि करते हैं, जिनके नाभिकमलसे पैदा होनेपर भी जिनकी कृपासे ही ये उनके रूपका दर्शन कर सके थे, वे संसारकी स्थिति, उत्पत्ति और प्रलयके हेतु, सर्वान्तर्यामी और मायाके स्वामी परमपुरुष परमात्मा अपनी मायाका त्याग करके किसमें किस रूपसे शयन करते हैं? ॥ ९-१०॥✎ 166

यह अर्थ श्लोक 9–10 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #166 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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