बेटा नारद! संकल्पसे विश्वकी रचना करनेवाले षडैश्वर्यसम्पन्न श्रीहरिका मैंने तुम्हारे सामने संक्षेपसे वर्णन किया। जो कुछ कार्य-कारण अथवा भाव-अभाव है, वह सब भगवान्से भिन्न नहीं है। फिर भी भगवान् तो इससे पृथक् भी हैं ही॥ ५०॥✎ 161162163164
सोऽयं तेऽभिहितस्तात भगवान् विश्वभावनः।
समासेन हरेर्नान्यदन्यस्मात् सदसच्च यत्॥ ५०
बेटा नारद! संकल्पसे विश्वकी रचना करनेवाले षडैश्वर्यसम्पन्न श्रीहरिका मैंने तुम्हारे सामने संक्षेपसे वर्णन किया। जो कुछ कार्य-कारण अथवा भाव-अभाव है, वह सब भगवान्से भिन्न नहीं है। फिर भी भगवान् तो इससे पृथक् भी हैं ही॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.7.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 218) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/7/50/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)