श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.6.26

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

गतयो मतयः श्रद्धा प्रायश्चित्तं समर्पणम्।

पुरुषावयवैरेते२ सम्भाराः सम्भृता मया॥ २६

gatayo matayaḥ śraddhā prāyaścittaṃ samarpaṇam|

puruṣāvayavairete sambhārāḥ sambhṛtā mayā|| 26

अर्थ

ऋषिश्रेष्ठ! यज्ञके लिये आवश्यक पात्र आदि वस्तुएँ, जौ, चावल आदि ओषधियाँ, घृत आदि स्नेहपदार्थ, छः रस, लोहा, मिट्टी, जल, ऋक्, यजुः, साम, चातुर्होत्र, यज्ञोंके नाम, मन्त्र, दक्षिणा, व्रत, देवताओंके नाम, पद्धतिग्रन्थ, संकल्प, तन्त्र (अनुष्ठानकी रीति), गति, मति, श्रद्धा, प्रायश्चित्त और समर्पण—यह समस्त यज्ञ-सामग्री मैंने विराट् पुरुषके अंगोंसे ही इकट्ठी की॥ २४—२६॥✎ 141 142

यह अर्थ श्लोक 24–26 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—रेतैः।

    (मुद्रित पृष्ठ 206)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #141 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #142 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें