॥ श्रीहरिः ॥
महातलं तु गुल्फाभ्यां प्रपदाभ्यां रसातलम्।
पातालं पादतलत इति लोकमयः पुमान्॥ ४१
mahātalaṃ tu gulphābhyāṃ prapadābhyāṃ rasātalam|
pātālaṃ pādatalata iti lokamayaḥ pumān|| 41
अर्थ
एड़ीके ऊपरकी गाँठोंमें महातल, पंजे और एड़ियोंमें रसातल और तलुओंमें पाताल समझना चाहिये। इस प्रकार विराट् पुरुष सर्वलोकमय है ॥ ४१॥
महातलं तु गुल्फाभ्यां प्रपदाभ्यां रसातलम्।
पातालं पादतलत इति लोकमयः पुमान्॥ ४१
एड़ीके ऊपरकी गाँठोंमें महातल, पंजे और एड़ियोंमें रसातल और तलुओंमें पाताल समझना चाहिये। इस प्रकार विराट् पुरुष सर्वलोकमय है ॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.5.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 203) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/5/41/