श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.40

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तत्कट्यां चातलं क्लृप्तमूरुभ्यां वितलं विभोः।

जानुभ्यां सुतलं शुद्धं जङ्घाभ्यां तु तलातलम्॥ ४०

tatkaṭyāṃ cātalaṃ klṛptamūrubhyāṃ vitalaṃ vibhoḥ|

jānubhyāṃ sutalaṃ śuddhaṃ jaṅghābhyāṃ tu talātalam|| 40

अर्थ

उस विराट् पुरुषकी कमरमें अतल, जाँघोंमें वितल, घुटनोंमें पवित्र सुतललोक और जंघाओंमें तलातलकी कल्पना की गयी है॥ ४०॥

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