श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.27

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

वायोरपि विकुर्वाणात् कालकर्मस्वभावतः।

उदपद्यत तेजो वै रूपवत् स्पर्शशब्दवत्॥ २७

vāyorapi vikurvāṇāt kālakarmasvabhāvataḥ|

udapadyata tejo vai rūpavat sparśaśabdavat|| 27

अर्थ

काल, कर्म और स्वभावसे वायुमें भी विकार हुआ। उससे तेजकी उत्पत्ति हुई। इसका प्रधान गुण रूप है। साथ ही इसके कारण आकाश और वायुके गुण शब्द एवं स्पर्श भी इसमें हैं॥ २७॥✎ 137 138

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #137 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #138 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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