श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.5.26

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

नभसोऽथ विकुर्वाणादभूत् स्पर्शगुणोऽनिलः।

परान्वयाच्छब्दवांश्‍च प्राण ओजः सहो बलम्॥ २६

nabhaso'tha vikurvāṇādabhūt sparśaguṇo'nilaḥ|

parānvayācchabdavāṃśca prāṇa ojaḥ saho balam|| 26

अर्थ

जब आकाशमें विकार हुआ, तब उससे वायुकी उत्पत्ति हुई; उसका गुण स्पर्श है। अपने कारणका गुण आ जानेसे यह शब्दवाला भी है। इन्द्रियोंमें स्फूर्ति, शरीरमें जीवनीशक्ति, ओज और बल इसीके रूप हैं॥ २६॥✎ 137 138

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #137 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #138 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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