श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.6

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

भूय एव विवित्सामि भगवानात्ममायया।

यथेदं सृजते विश्‍वं दुर्विभाव्यमधीश्‍वरैः॥ ६

bhūya eva vivitsāmi bhagavānātmamāyayā|

yathedaṃ sṛjate viśvaṃ durvibhāvyamadhīśvaraiḥ|| 6

अर्थ

मैं आपसे फिर भी यह जानना चाहता हूँ कि भगवान् अपनी मायासे इस संसारकी सृष्टि कैसे करते हैं। इस संसारकी रचना तो इतनी रहस्यमयी है कि ब्रह्मादि समर्थ लोकपाल भी इसके समझनेमें भूल कर बैठते हैं॥ ६॥✎ 133

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #133 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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