श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.4.5

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

राजोवाच

समीचीनं वचो ब्रह्मन् सर्वज्ञस्य तवानघ।

तमो विशीर्यते मह्यं हरेः कथयतः कथाम्॥ ५

samīcīnaṃ vaco brahman sarvajñasya tavānagha|

tamo viśīryate mahyaṃ hareḥ kathayataḥ kathām|| 5

अर्थ

परीक्षित‍्ने पूछा—भगवत्स्वरूप मुनिवर! आप परम पवित्र और सर्वज्ञ हैं। आपने जो कुछ कहा है, वह सत्य एवं उचित है। आप ज्यों-ज्यों भगवान्‌की कथा कहते जा रहे हैं, त्यों-त्यों मेरे अज्ञानका परदा फटता जा रहा है॥ ५॥✎ 133

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #133 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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