॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.10.21
यदाऽऽत्मनि निरालोकमात्मानं च दिदृक्षतः।
निर्भिन्ने ह्यक्षिणी३ तस्य ज्योतिश्चक्षुर्गुणग्रहः॥ २१
yadā''tmani nirālokamātmānaṃ ca didṛkṣataḥ|
nirbhinne hyakṣiṇī tasya jyotiścakṣurguṇagrahaḥ|| 21
अर्थ
पहले उनके शरीरमें प्रकाश नहीं था; फिर जब उन्हें अपनेको तथा दूसरी वस्तुओंको देखनेकी इच्छा हुई, तब नेत्रोंके छिद्र, उनका अधिष्ठाता सूर्य और नेत्रेन्द्रिय प्रकट हो गये। इन्हींसे रूपका ग्रहण होने लगा॥ २१॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—अक्षिणी।