tatra vāyurgandhavaho ghrāṇo nasi jighṛkṣataḥ|| 20
अर्थ
श्वासके वेगसे नासिका-छिद्र प्रकट हो गये। जब उन्हें सूँघनेकी इच्छा हुई, तब उनकी नाक घ्राणेन्द्रिय आकर बैठ गयी और उसके देवता गन्धको फैलानेवाले वायुदेव प्रकट हुए॥ २०॥
नासिके निरभिद्येतां दोधूयति नभस्वति।
तत्र वायुर्गन्धवहो घ्राणो नसि जिघृक्षतः॥ २०
श्वासके वेगसे नासिका-छिद्र प्रकट हो गये। जब उन्हें सूँघनेकी इच्छा हुई, तब उनकी नाक घ्राणेन्द्रिय आकर बैठ गयी और उसके देवता गन्धको फैलानेवाले वायुदेव प्रकट हुए॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.10.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 230) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/10/20/