श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.20

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

नासिके निरभिद्येतां दोधूयति नभस्वति।

तत्र वायुर्गन्धवहो घ्राणो नसि जिघृक्षतः॥ २०

nāsike nirabhidyetāṃ dodhūyati nabhasvati|

tatra vāyurgandhavaho ghrāṇo nasi jighṛkṣataḥ|| 20

अर्थ

श्वासके वेगसे नासिका-छिद्र प्रकट हो गये। जब उन्हें सूँघनेकी इच्छा हुई, तब उनकी नाक घ्राणेन्द्रिय आकर बैठ गयी और उसके देवता गन्धको फैलानेवाले वायुदेव प्रकट हुए॥ २०॥

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