श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.17

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

प्राणेन क्षिपता क्षुत् तृडन्तरा जायते प्रभोः१।

पिपासतो जक्षतश्‍च प्राङ्मुखं निरभिद्यत॥ १७

prāṇena kṣipatā kṣut tṛḍantarā jāyate prabhoḥ|

pipāsato jakṣataśca prāṅmukhaṃ nirabhidyata|| 17

अर्थ

जब प्राण जोरसे आने-जाने लगा, तब विराट् पुरुषको भूख-प्यासका अनुभव हुआ। खाने-पीनेकी इच्छा करते ही सबसे पहले उनके शरीरमें मुख प्रकट हुआ॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—विभोः।

    (मुद्रित पृष्ठ 230)

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