श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.10.16

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अनुप्राणन्ति यं प्राणाः प्राणन्तं सर्वजन्तुषु।

अपानन्तमपानन्ति नरदेवमिवानुगाः॥ १६

anuprāṇanti yaṃ prāṇāḥ prāṇantaṃ sarvajantuṣu|

apānantamapānanti naradevamivānugāḥ|| 16

अर्थ

जैसे सेवक अपने स्वामी राजाके पीछे-पीछे चलते हैं, वैसे ही सबके शरीरोंमें प्राणके प्रबल रहनेपर ही सारी इन्द्रियाँ प्रबल रहती हैं और जब वह सुस्त पड़ जाता है, तब सारी इन्द्रियाँ भी सुस्त हो जाती हैं॥ १६॥

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