श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.9

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

परिनिष्ठितोऽपि नैर्गुण्य उत्तमश्लोकलीलया।

गृहीतचेता राजर्षे आख्यानं यदधीतवान्॥ ९

pariniṣṭhito'pi nairguṇya uttamaślokalīlayā|

gṛhītacetā rājarṣe ākhyānaṃ yadadhītavān|| 9

अर्थ

राजर्षे! मेरी निर्गुणस्वरूप परमात्मामें पूर्ण निष्ठा है। फिर भी भगवान् श्रीकृष्णकी मधुर लीलाओंने बलात् मेरे हृदयको अपनी ओर आकर्षित कर लिया। यही कारण है कि मैंने इस पुराणका अध्ययन किया॥ ९॥

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