hāso janonmādakarī ca māyā durantasargo yadapāṅgamokṣaḥ|| 31
अर्थ
वेदोंको भगवान्का ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं और यमको दाढ़ें। सब प्रकारके स्नेह दाँत हैं और उनकी जगन्मोहिनी मायाको ही उनकी मुसकान कहते हैं। यह अनन्त सृष्टि उसी मायाका कटाक्ष-विक्षेप है॥ ३१॥
छन्दांस्यनन्तस्य शिरो गृणन्ति दंष्ट्रा यमः स्नेहकला द्विजानि।
हासो जनोन्मादकरी च माया दुरन्तसर्गो यदपाङ्गमोक्षः॥ ३१
वेदोंको भगवान्का ब्रह्मरन्ध्र कहते हैं और यमको दाढ़ें। सब प्रकारके स्नेह दाँत हैं और उनकी जगन्मोहिनी मायाको ही उनकी मुसकान कहते हैं। यह अनन्त सृष्टि उसी मायाका कटाक्ष-विक्षेप है॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 184) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/2/1/31/