॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 2.1.30
द्यौरक्षिणी चक्षुरभूत्पतङ्गः पक्ष्माणि विष्णोरहनी उभे च।
तद्भ्रूविजृम्भः परमेष्ठिधिष्ण्यमापोऽस्य तालू रस एव जिह्वा॥ ३०✎ 1530
dyaurakṣiṇī cakṣurabhūtpataṅgaḥ pakṣmāṇi viṣṇorahanī ubhe ca|
tadbhrūvijṛmbhaḥ parameṣṭhidhiṣṇyamāpo'sya tālū rasa eva jihvā|| 30
अर्थ
भगवान् विष्णुके नेत्र अन्तरिक्ष हैं, उनमें देखनेकी शक्ति सूर्य है, दोनों पलकें रात और दिन हैं, उनका भ्रूविलास ब्रह्मलोक है। तालु जल है और जिह्वा रस॥ ३०॥