श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.25

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

आण्डकोशे शरीरेऽस्मिन् सप्तावरणसंयुते।

वैराजः पुरुषो योऽसौ भगवान् धारणाश्रयः॥ २५

āṇḍakośe śarīre'smin saptāvaraṇasaṃyute|

vairājaḥ puruṣo yo'sau bhagavān dhāraṇāśrayaḥ|| 25

अर्थ

जल, अग्‍नि, वायु, आकाश, अहंकार, महत्तत्त्व और प्रकृति—इन सात आवरणोंसे घिरे हुए इस ब्रह्माण्डशरीरमें जो विराट् पुरुष भगवान् हैं, वे ही धारणाके आश्रय हैं, उन्हींकी धारणा की जाती है॥ २५॥

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