॥ श्रीहरिः ॥
गृहात् प्रव्रजितो धीरः पुण्यतीर्थज१लाप्लुतः।
शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने॥ १६
gṛhāt pravrajito dhīraḥ puṇyatīrthajalāplutaḥ|
śucau vivikta āsīno vidhivatkalpitāsane|| 16
अर्थ
धैर्यके साथ घरसे निकलकर पवित्र तीर्थके जलमें स्नान करे और पवित्र तथा एकान्त स्थानमें विधिपूर्वक आसन लगाकर बैठ जाय॥ १६॥✎ 116
गृहात् प्रव्रजितो धीरः पुण्यतीर्थजलाप्लुतः।
शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने॥ १६
धैर्यके साथ घरसे निकलकर पवित्र तीर्थके जलमें स्नान करे और पवित्र तथा एकान्त स्थानमें विधिपूर्वक आसन लगाकर बैठ जाय॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 183) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/1/16/टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—परिप्लुतः।
(मुद्रित पृष्ठ 183)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में