श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 2.1.16

द्वितीय स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

गृहात् प्रव्रजितो धीरः पुण्यतीर्थज१लाप्लुतः।

शुचौ विविक्त आसीनो विधिवत्कल्पितासने॥ १६

gṛhāt pravrajito dhīraḥ puṇyatīrthajalāplutaḥ|

śucau vivikta āsīno vidhivatkalpitāsane|| 16

अर्थ

धैर्यके साथ घरसे निकलकर पवित्र तीर्थके जलमें स्नान करे और पवित्र तथा एकान्त स्थानमें विधिपूर्वक आसन लगाकर बैठ जाय॥ १६॥✎ 116

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—परिप्लुतः।

    (मुद्रित पृष्ठ 183)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्‌में

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