छिन्द्यादसङ्गशस्त्रेण स्पृहां देहेऽनु४ ये च तम्॥ १५
antakāle tu puruṣa āgate gatasādhvasaḥ|
chindyādasaṅgaśastreṇa spṛhāṃ dehe'nu ye ca tam|| 15
अर्थ
मृत्युका समय आनेपर मनुष्य घबराये नहीं। उसे चाहिये कि वह वैराग्यके शस्त्रसे शरीर और उससे सम्बन्ध रखनेवालोंके प्रति ममताको काट डाले॥ १५॥✎ 116
अन्तकाले तु पुरुष आगते गतसाध्वसः।
छिन्द्यादसङ्गशस्त्रेण स्पृहां देहेऽनु ये च तम्॥ १५
मृत्युका समय आनेपर मनुष्य घबराये नहीं। उसे चाहिये कि वह वैराग्यके शस्त्रसे शरीर और उससे सम्बन्ध रखनेवालोंके प्रति ममताको काट डाले॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 2.1.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 182) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/2/1/15/
टिप्पणियाँ
३
प्रा० पा०—ऽपि।
(मुद्रित पृष्ठ 182)
४
प्रा० पा०—देहानुयायिनीम्।
(मुद्रित पृष्ठ 182)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#116 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् में → भगवान्में