मार्कण्डेय मुनिने कहा—देवदेवेश! शरणागतभयहारी अच्युत! आपकी जय हो! जय हो! हमारे लिये बस इतना ही वर पर्याप्त है कि आपने कृपा करके अपने मनोहर स्वरूपका दर्शन कराया॥ ४॥✎ 1784
जितं ते देवदेवेश प्रपन्नार्तिहराच्युत।
वरेणैतावतालं नो यद् भवान् समदृश्यत॥ ४
मार्कण्डेय मुनिने कहा—देवदेवेश! शरणागतभयहारी अच्युत! आपकी जय हो! जय हो! हमारे लिये बस इतना ही वर पर्याप्त है कि आपने कृपा करके अपने मनोहर स्वरूपका दर्शन कराया॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.9.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 953) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/9/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)