श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.9.28

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

खं रोदसी भगणानद्रिसागरान्

द्वीपान् सवर्षान् ककुभः सुरासुरान्।

वनानि देशान् सरितः पुराकरान्

खेटान् व्रजानाश्रमवर्णवृत्तयः॥ २८

khaṃ rodasī bhagaṇānadrisāgarān

dvīpān savarṣān kakubhaḥ surāsurān|

vanāni deśān saritaḥ purākarān

kheṭān vrajānāśramavarṇavṛttayaḥ|| 28

अर्थ

उन्होंने उस शिशुके उदरमें आकाश, अन्तरिक्ष, ज्योतिर्मण्डल, पर्वत, समुद्र, द्वीप, वर्ष, दिशाएँ, देवता, दैत्य, वन, देश, नदियाँ, नगर, खानें, किसानोंके गाँव, अहीरोंकी बस्तियाँ, आश्रम, वर्ण, उनके आचार-व्यवहार, पंचमहाभूत, भूतोंसे बने हुए प्राणियोंके शरीर तथा पदार्थ, अनेक युग और कल्पोंके भेदसे युक्त काल आदि सब कुछ देखा। केवल इतना ही नहीं जिन देशों, वस्तुओं और कालोंके द्वारा जगत‍्का व्यवहार सम्पन्‍न होता है, वह सब कुछ वहाँ विद्यमान था। कहाँतक कहें, यह सम्पूर्ण विश्‍व न होनेपर भी वहाँ सत्यके समान प्रतीत होते देखा॥ २८-२९॥

यह अर्थ श्लोक 28–29 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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