कहीं शोकग्रस्त हो जाते तो कहीं मोहग्रस्त। कभी दुःख-ही-दुःखके निमित्त आते तो कभी तनिक सुख भी मिल जाता। कभी भयभीत होते, कभी मर जाते तो कभी तरह-तरहके रोग उन्हें सताने लगते॥ १८॥
क्वचिच्छोकं क्वचिन्मोहं क्वचिद् दुःखं सुखं भयम्।
क्वचिन्मृत्युमवाप्नोति व्याध्यादिभिरुतार्दितः॥ १८
कहीं शोकग्रस्त हो जाते तो कहीं मोहग्रस्त। कभी दुःख-ही-दुःखके निमित्त आते तो कभी तनिक सुख भी मिल जाता। कभी भयभीत होते, कभी मर जाते तो कभी तरह-तरहके रोग उन्हें सताने लगते॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.9.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 956) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/9/18/