॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.9.15
सक्ष्मान्तरिक्षं सदिवं सभागणं
त्रैलोक्यमासीत् सह दिग्भिराप्लुतम्।
स एक एवोर्वरितो महामुनि-
र्बभ्राम विक्षिप्य जटा जडान्धवत्॥ १५
sakṣmāntarikṣaṃ sadivaṃ sabhāgaṇaṃ
trailokyamāsīt saha digbhirāplutam|
sa eka evorvarito mahāmuni-
rbabhrāma vikṣipya jaṭā jaḍāndhavat|| 15
अर्थ
पृथ्वी, अन्तरिक्ष, स्वर्ग, ज्योतिर्मण्डल (ग्रह, नक्षत्र एवं तारोंका समूह) और दिशाओंके साथ तीनों लोक जलमें डूब गये। बस, उस समय एकमात्र महामुनि मार्कण्डेय ही बच रहे थे। उस समय वे पागल और अंधेके समान जटा फैलाकर यहाँसे वहाँ और वहाँसे यहाँ भाग-भागकर अपने प्राण बचानेकी चेष्टा कर रहे थे॥ १५॥