सूतजी कहते हैं—जब ज्ञानसम्पन्न मार्कण्डेय मुनिने इस प्रकार स्तुति की, तब भगवान् नर-नारायणने प्रसन्न होकर मार्कण्डेयजीसे कहा॥ १॥
संस्तुतो भगवानित्थं मार्कण्डेयेन धीमता।
नारायणो नरसखः प्रीत आह भृगूद्वहम्॥ १
सूतजी कहते हैं—जब ज्ञानसम्पन्न मार्कण्डेय मुनिने इस प्रकार स्तुति की, तब भगवान् नर-नारायणने प्रसन्न होकर मार्कण्डेयजीसे कहा॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 12.9.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 953) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/12/9/1/