श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 12.8.9

द्वादश स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

कृष्णाजिनं साक्षसूत्रं कुशांश्‍च नियमर्द्धये।

अ‌ग्‍न्यर्कगुरुविप्रात्मस्वर्चयन् सन्ध्ययोर्हरिम्॥ ९

kṛṣṇājinaṃ sākṣasūtraṃ kuśāṃśca niyamarddhaye|

agnyarkaguruviprātmasvarcayan sandhyayorharim|| 9

अर्थ

काले मृगका चर्म, रुद्राक्षमाला और कुश—यही उनकी पूँजी थी। यह सब उन्होंने अपने आजीवन ब्रह्मचर्य-व्रतकी पूर्तिके लिये ही ग्रहण किया था। वे सायंकाल और प्रातःकाल अग्‍निहोत्र, सूर्योपस्थान, गुरुवन्दन, ब्राह्मण-सत्कार, मानस-पूजा और ‘मैं परमात्माका स्वरूप ही हूँ’ इस प्रकारकी भावना आदिके द्वारा भगवान्‌की आराधना करते॥ ९॥

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