॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 12.8.41
मूर्ती इमे भगवतो भगवंस्त्रिलोक्याः
क्षेमाय तापविरमाय च मृत्युजित्यै।
नाना बिभर्ष्यवितुमन्यतनूर्यथेदं
सृष्ट्वा पुनर्ग्रससि सर्वमिवोर्णनाभिः॥ ४१
mūrtī ime bhagavato bhagavaṃstrilokyāḥ
kṣemāya tāpaviramāya ca mṛtyujityai|
nānā bibharṣyavitumanyatanūryathedaṃ
sṛṣṭvā punargrasasi sarvamivorṇanābhiḥ|| 41
अर्थ
प्रभो! आपने केवल विश्वकी रक्षाके लिये ही जैसे मत्स्य-कूर्म आदि अनेकों अवतार ग्रहण किये हैं, वैसे ही आपने ये दोनों रूप भी त्रिलोकीके कल्याण, उसकी दुःख-निवृत्ति और विश्वके प्राणियोंको मृत्युपर विजय प्राप्त करानेके लिये ग्रहण किया है। आप रक्षा तो करते ही हैं, मकड़ीके समान अपनेसे ही इस विश्वको प्रकट करते हैं और फिर स्वयं अपनेमें ही लीन भी कर लेते हैं॥ ४१॥